What Is Narco Test And how it will help full inquery with DSP Davinder Singh ? नारको टेस्ट क्या है ?

What Is Narco Test And how it will helpfull query with DSP Davinder Singh

What Is Narco Test  And how it will help full inquery  with   DSP Davinder Singh ? नारको टेस्ट क्या है ?

DSP देविंदर सिंह आतंकियों की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किये गए है। व्यवस्था में बैठे कौन से लोग DSP की इस काम में मदद कर रहे थे, और यह आतंकियों की मदद करने वाला यह आंतरिक प्रशासनिक-राजनैतिक-न्यायिक गठजोड़ सिस्टम में किस सीमा तक फैला हुआ है, इसका पता लगाने के लिए मेरा प्रस्ताव है, कि DSP देविंदर सिंह का नागरिको की जूरी द्वारा सार्वजनिक नार्को टेस्ट लिया जाए। सार्वजनिक नार्को टेस्ट किये बिना इस तरह के मामले को किसी भी तरीके से उधेड़ा नहीं जा सकता।
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सीबीआई सरकार के निचे काम करती है, और नेताओ (सत्ता+ विपक्ष) जजों, उच्च अधिकारीयों आदि के साथ सीबीआई अधिकारीयों के अच्छे सम्बन्ध होते है। अच्छे सम्बन्ध होने की वजह है कि सीबीआई अधिकारियों को पदोन्नति देने, उन्हें नौकरी से निकालने, मैडल देने आदि के अधिकार नेताओ के पास है, और इसमें नागरिको का कोई दखल नहीं है।
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नारको टेस्ट क्या है ?Narco Analysis Test

                                       
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नारको टेस्ट पूछताछ की एक सुरक्षित प्रक्रिया है जिसमें डॉक्टर की देख-रेख में थोड़ी सोडियम पेंटाथेनोल नामक दवा दी जाती है। इस दवा के प्रभाव से व्यक्ति के दिमाग की योजना बनाने की क्षमता कुछ समय के लिए समाप्त हो जाती है। इससे व्यक्ति योजना बनाकर पूछे गए प्रश्नों के झूठे जवाब नहीं दे पाता, और सच बोलने लगता है। नारको टेस्ट के दौरान की गयी पूछताछ में आरोपी अपने खिलाफ महत्वपूर्ण सुराग उगल देता है। आरोपी द्वारा दिए गए इन जवाबो का पीछा करके सबूत जुटाये जा सकते है। निचे एक उदारहण से बताया गया है कि, नारको टेस्ट में पूछताछ किस तरह आगे बढती है :
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इंजेक्शन लगाने के बाद आरोपी के सामने निम्न क्रम में प्रश्न रखे जाते है :
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क्या तुम्हारा स्विस बैंक में खाता है ?
यदि आरोपी कहेगा - हाँ

तुम्हारा स्विस बैंक एकाउंट नंबर कहाँ लिखा हुआ है।
किताब में

वह किताब कहाँ पड़ी है ?
घर के लॉकर में या मेरी लाइब्रेरी की ऑफिस टेबल में
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अब जांच अधिकारी लाइब्रेरी में जाकर एकाउंट नंबर की तलाश करेंगे। तो इसी तर्ज पर देविंदर सिंह से पुछा जाएगा कि, वह आतंकियों की मदद कब से कर रहा था, किसके आदेश से कर रहा था, उसे इसके लिए कितना पैसा मिला था, इस पैसे को उसने कहाँ रखा, इसमें से कितना पैसा उसने किसी नेता / जज / मंत्री / उच्चाधिकारी को दिया आदि। पैसा कब दिया / लिया गया आदि आदि। और इस तरह उससे पिछले 20 वर्ष की सर्विस के दौरान सभी मामलो पर प्रश्न पूछे जायेंगे।
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अमूमन, नार्को टेस्ट का इंजेक्शन देखने के साथ ही आरोपी अपने सभी गुनाह कबूल करने लगता है, और उसे बहुधा उसे इंजेक्शन देने की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि उसे यह भय रहता है कि, यदि इंजेक्शन लगाया गया तो उसके मुंह से असीमित सूचनाएं निकल सकती है। जब वह देखता है कि जूरी के सामने मेरा फेयर ट्रायल हो रहा है, और बच निकलने की सम्भावना लगभग शून्य है तो वह पूरे रैकेट को खोलना शुरू कर देता है।
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नारको टेस्ट में आरोपी के बयानों को सबूत नहीं माना जाता है। लेकिन बयानों में दी गयी सूचनाओं के आधार पर सबूत जुटाए जाते है। भारत में सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने नार्को टेस्ट पर बैन लगाया हुआ है। मतलब बैन इस तरह से है कि -- यदि आरोपी खुद नार्को टेस्ट की सहमती देता है, तो ही नार्को टेस्ट होगा, और यदि आरोपी अनुमति देने के बाद अंतिम समय में भी पलट जाता है, तो नार्को टेस्ट नहीं होगा !!
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असल में संगठित अपराध एवं आन्तरिक प्रशासनिक-राजनैतिक-न्यायिक गठजोड़ को जूरी के सामने सार्वजनिक नार्को टेस्ट के बिना खोला ही नहीं जा सकता।
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भारत में मुख्यधारा की सभी पार्टियाँ एवं उनके नेता जूरी ट्रायल के भी खिलाफ है, नार्को टेस्ट के भी खिलाफ है, और सार्वजनिक नार्को टेस्ट के भी खिलाफ है !! उनका स्टेंड रहता है कि, हम बंद कमरे में पूछताछ करके बता देंगे कि आरोपी ने क्या कहा, और क्या सबूत दिए। यदि आरोपी किसी बड़े आदमी के इन्वोल्व होने की बात बताता है और उसके खिलाफ सबूत देता है तो ये लोग अमुक बड़े आदमी का नाम जांच में से बाहर निकालने के एवज में उससे पैसा खींच लेते है, और सबूत नष्ट कर देते है !! पिछले 70 साल से सभी सरकारें इसी तरह से जांचे करती आई है।
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यही वजह है कि आपको मुख्य धारा की किसी भी पार्टी का एक भी कार्यकर्ता सार्वजनिक नार्को टेस्ट के क़ानून का समर्थन करता नहीं दिखेगा। और इसका विरोध करने के लिए वे क्या तरीका इस्तेमाल करते है ? वे "नार्को टेस्ट इन पब्लिक" शब्द पर चुप रहते है। उन्होंने इस बात की पूरी एहतियात रखी हुयी है कि, इस शब्द का प्रयोग नहीं किया जाए। मतलब, वे यह बहस करना ही नही चाहते कि, "नार्को टेस्ट इन पब्लिक" ठीक प्रक्रिया है या गलत है, यह होना चाहिए या नहीं होना चाहिए आदि। वे हमेशा इस लफ्ज पर चुप रहेंगे !! कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखायेंगे।
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अभी DSP देविंदर सिंह के मामले में भी पूरे देश के टीवी चैनल्स और सोशल मीडिया पर आप इसकी बेहद ऊँचे दर्जे की बौद्धिक बहस देखेंगे, लेकिन पेड मीडिया में कोई भी बुद्धिजीवी, राजनेता यह कहता नजर नहीं आएगा कि देविंदर सिंह का सार्वजनिक नार्को टेस्ट लिया जाना चाहिए , ताकि यह बात सामने आ सके कि यह आदमी संदेह के दायरे में आने के बावजूद पिछले 20 साल से सिस्टम में कैसे टिका हुआ था !!
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कृपया इस बात पर ध्यान दें कि मैं यहाँ जज के निर्देशन में बंद कमरे में किये जाने वाले "नार्को टेस्ट के ड्रामे" की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं यहाँ नागरिको की जूरी द्वारा सार्वजानिक नार्को टेस्ट की बात कर रहा हूँ। निचे मैंने इसकी प्रक्रिया बतायी है।
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DSP देविंदर सिंह के नार्को टेस्ट के लिए प्रस्तावित गेजेट नोटिफिकेशन
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नारको टेस्ट के लिए जूरी का गठन :
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1. [ प्रधानमंत्री ]
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प्रधानमंत्री इस मामले की सुनवाई हेतु जूरी का गठन करने के लिए एक जूरी प्रशासक की नियुक्ति करेंगे।
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2. [ जूरी प्रशासक ]
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2.1. जूरी प्रशासक एक सार्वजनिक बैठक में दिल्ली राज्य की मतदाता सूचियों में से 25 वर्ष से 55 वर्ष की आयु के 50 मतदाताओं का चुनाव लॉटरी द्वारा करेगा। इन सदस्यों का साक्षात्कार लेने के बाद जूरी प्रशासक किन्ही 20 सदस्यों को निकाल सकता है। इस तरह 30 महाजूरी सदस्य शेष रह जायेंगे।
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2.2 अब यह महाजूरी मंडल मामले की सुनवाई के लिए एक सार्वजनिक बैठक में दिल्ली की मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा 30 नागरिको को चुनेगा और, इसमें से 24 नागरिको की जूरी का गठन करेगा। जूरी सदस्यों की आयु 35 वर्ष से 55 वर्ष के बीच होगी।
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2.3. जूरी प्रशासक इन 24 नागरिकों को 12 जूरी सदस्यों के दो समूह में बांटेगा। जिला जूरी प्रशासक एक श्रेणी-1 के अफसर को नारको टेस्ट का प्रभारी नियुक्त करेगा। प्रभारी का चयन करने के लिए पहले उपलब्ध विकल्पों की सूची बनायी जायेगी और तब लॉटरी द्वारा नारको प्रभारी का चयन कर लिया जाएगा। जूरी सदस्य चाहे तो सेवानिवृत जांच अधिकारियों के नाम भी इसमें शामिल कर सकते है, और एक जाचं अधिकारी की जगह 3 का पैनल बना सकते है।
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3. [ नारको जांच के प्रभारी ]
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नारको का इंजेक्शन लगाने से पहले समूह-क के जूरी सदस्य प्रश्न बनायेंगे, और यदि समूह-ख में 7 से अधिक जूरी सदस्य उसको स्वीकृति दे देते है तो फिर नार्को प्रभारी अमुक प्रश्न पूछेगा। नार्को-जांच में प्रश्नों के प्राप्त उत्तर के आधार पर, समूह-क में कोई जूरी सदस्य या जूरी द्वारा निश्चित विशेषज्ञ नया प्रश्न भी बना सकता है और यदि समूह-ख उस प्रश्न को स्वीकृत करता है, तो जांच प्रभारी उस प्रश्न को पूछेगा । कोई भी प्रश्न समूह-ख के बहुमत जूरी सदस्यों की स्वीकृति के बिना नहीं पूछा जायेगा।
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4. [ जूरी सदस्य ]
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जूरी सदस्य ये निर्णय करेंगे कि नार्को जांच निजी हो या सार्वजनिक हो। और यदि जांच सार्वजनिक की जाती है तो जूरी सदस्य यह तय करेंगे कि कौनसे हिस्से छुपाये जाने चाहिए। यदि जांच के दौरान किसी महिला का नाम सामने आता है, और यदि जूरी संदिग्ध / पीड़ित महिला का नाम गुप्त रखना चाहती है, और यदि अमुक महिला का भी पोलीग्राफ, ब्रेन-मैपिंग, नार्को जांच की जाती है तो जूरी सदस्य इसे सार्वजानिक नहीं कर करेंगे।
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4.1. पूरी नार्को जाँच की प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की जायेगी, और जूरी सदस्य इसे सार्वजनिक करने के बारे में तय करेंगे।
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4.2. यदि समूह-क में कोई व्यक्ति अपना स्थान समूह-ख में किसी व्यक्ति से बदलना चाहता है, तो वो ऐसा कर सकता है।
जूरी सदस्यों का बहुमत, जिला जूरी प्रशासक द्वारा बनाये गए विशेषज्ञ दल में से किसी विशेषज्ञ को नार्को जांच के लिए प्रश्न बनाने की स्वीकृति दे सकते हैं।
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4.2.1. प्रश्नों के बनाने का कार्य केवल दोनों समूहों में जूरी सदस्यों द्वारा किया जायेगा और गुप्त रूप से किया जायेगा।
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4.2.2. प्रश्न के बनाने के समय जज, वकील, आदि उपस्थित नहीं हो सकेंगे।
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4.2.3. प्रश्न बनाने का सत्र तब समाप्त होगा जब बहुमत जूरी सदस्य सहमत हों कि प्रश्न बनाने का कार्य अब समाप्त हो चुका है।
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5. [ जूरी सदस्य एवं जांच अधिकारी ]
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5.1. पोलीग्राफ, नार्को जांच और ब्रेन-मैपिंग - तीनों तरह के जांच में प्राप्त उत्तर को सबूत के रूप में नहीं लिया जायेगा |
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5.2. मामले की जांच-पड़ताल करने वाला पुलिस अफसर इस जांच में प्राप्त उत्तर के आधार पर आगे जांच करके और सबूत प्राप्त कर सकता है |
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5.3. जूरी की स्वीकृति से, नार्को जांच प्रभारी जूरी मुकदमा शुरू होने से पहले भी पोलीग्राफ, ब्रेन-मैपिंग या नारको जाँच करवा सकता है | वो जांच की प्रक्रिया भी पिछले धाराओं में बताई गयी प्रक्रिया के सामान होगी |
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5.4. जूरी की स्वीकृति बिना नार्को टेस्ट नहीं किया जा सकेगा। यदि आरोपी अपनी सहमति भी दे दे, तो भी नारको-जांच करवाने के लिए जूरी सदस्यों की स्वीकृति आवश्यक होगी।
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6. [ सभी के लिए निर्देश ]
यदि जूरी तय करती है कि नारको-जांच सार्वजानिक होगा तो मीडिया को लाइव प्रसारण के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
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7. यदि जाँच अधिकारी के बारे में कोई अनियमितता या पक्षपात की शिकायत आती है तो इसकी सुनवाई भी जूरी द्वारा की जायेगी। जूरी सदस्य चाहे तो जांच अधिकारी पर दंड लगा सकते है, या उसे जाँच से हटाकर किसी अन्य जांच अधिकारी को नियुक्त कर सकते है।
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-----नार्को टेस्ट अधिसूचना का समापन----
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इस क़ानून को गेजेट में लाने के लिए आप पीएम को ट्विट भेज सकते है।
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ट्वीट में यह लिखें – प्रधानमन्त्री जी, कृपया DSP देविंदर सिंह का जूरी द्वारा सार्वजनिक नार्को लेने के आदेश जारी करें - #NarcoTestInPublic , JuryTrialOnDspDevinder
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हैश कोड : #NarcoTestInPublic , #JuryTrialOnDspDevinder , #JuryCourt
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